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स्मृति शेष..1971 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन राष्ट्रपति के बेटे को टक्कर देने वाले युवा विजय मलैया ने.. नरसिंहगढ में सीमेंट फेक्ट्री की स्थापना हेतु सांसद शंकर गिरी से चुनावी वायदे को पूरा करवाने हेतु भी किया था सार्थक प्रयास..

  बरसों तक विपक्ष के इकलौते उम्मीदवार रहे विजय कुमार जी मलैया..

गांधीवादी विचारक सहज सरल उदार हरदम दूसरों की मदद के लिए खड़े रहने वाले बाबू विजय कुमार जी मलैया अब हमारे बीच में नहीं है। 70 के दशक में  राजनैतिक पारी की शुरुआत करने वाले वह युवा विजय मलैया ही थे जो तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी के बेटे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे। वह चुनाव जरूर हार गए थे लेकिन हारने के बाद भी जीतने वाले प्रत्याशी द्वारा सीमेंट फैक्ट्री देने के वायदे को पूरा कराने के लिए गांधीवादी  तरीके  से तब तक सक्रिय बने रहे थे जब तक की नरसिंहगढ़ में डायमंड सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना की स्वीकृति नहीं मिल गई थी। 

दमोह कटनी संसदीय क्षेत्र से वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर दक्षिण भारत से दमोह भेजे गए तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वी वी गिरी के बेटे शंकर गिरी के मुकाबले में दमोह कटनी लोकसभा क्षेत्र से कोई भी प्रत्याशी सामने आने की हिम्मत नही दिखा रहा था। यहां तक की जनसंघ की टिकट पर भी कोई चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था। ऐसे में तब के युवा गांधीवादी विचारक विजय कुमार मलैया ने श्री मोरारजी देसाई की संगठन कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतकर तत्कालीन राष्ट्रपति के बेटे कांग्रेस प्रत्याशी शंकर गिरी को चुनौती दी। उस समय अहिंदी भाषी कांग्रेस प्रत्याशी शंकर गिरी के चुनाव की कमान तत्कालीन कांग्रेस नेता प्रभु नारायण टंडन संभाले हुए थे उन्होंने जब देखा कि काग्रेस प्रत्याशी लोगों के बीच में भाषण के मामले में विजय मलैया के मुकाबले पिछड़ रहे हैं तो उन्होंने उनको सिर्फ इंदिरा गांधी की जय का नारा याद करा दिया। वह जहां भी जाते वह इंदिरा जी की जय बोल कर आगे बढ़ जाते। चूंकि वह समय भारत पाकिस्तान युद्ध के साथ पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी के वर्ष 1971 का था। पूरे देश में श्रीमती इंदिरा गांधी के पक्ष में लहर चल रही थी। ऐसे में देशभर में कांग्रेस प्रत्याशी आंख मीच कर जीत रहे थे इसके बावजूद विपक्ष के उम्मीदवार विजय कुमार मलैया द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति के बेटे को कांटे की टक्कर देकर जनता से अनेक वायदे कराने को मजबूर कर दिया। इसी का नतीजा रहा 1971 के चुनाव को जीतने के बाद सांसद शंकर गिरी ने दमोह को जहां इनकम टैक्स ऑफिस की सौगात दिलाई वही नरसिंहगढ़ में बिड़ला परिवार द्वारा डायमंड सीमेंट की आधारशिला रख वाई गई। हालांकि चुनाव जीतने के बाद सांसद शंकर गिरी कभी लौटकर दोबारा दमोह नहीं आए लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर कांग्रेस नेता श्री प्रभु नारायण टंडन बखूबी सक्रिय भूमिका दर्ज कराते रहें। और विजय मलैया विपक्ष की भूमिका निर्वहन करते हुए चुनावी वायदों की याद दिला कर उनको पूरा करवाते रहें।

इसके बाद आपातकाल के दौर के बाद इमरजेंसी हटने पर 1977 में हुए लोक सभा चुनाव में दमोह से कटनी को हटाकर दमोह पन्ना संसदीय क्षेत्र बना दिया गया। और उस समय की जनता लहर में जब विजय कुमार मलैया आसानी से लोकसभा चुनाव लड़कर सांसद बन सकते थे तब पन्ना के महाराजा नरेंद्र सिंह जूदेव को विपक्षी दलों द्वारा चुनाव मैदान में उतारा गया। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी विट्ठल भाई पटेल को एकतरफा मुकाबले में हराकर जीत हासिल की। लेकिन ढाई साल बाद ही जनता पार्टी की सरकार गिर जाने के बाद जब 1980 में पुनः लोकसभा के चुनाव हुए और श्रीमती इंदिरा गांधी किंग मेकर बनकर उभरी तो विपक्ष के पास दमोह पन्ना क्षेत्र से फिर कोई प्रत्याशी चुनाव लड़ने वाला नहीं था। और फिर जनता पार्टी की तरफ से फिर बाबू विजय कुमार मलैया को चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरना पड़ा। श्री मलैया ने तब के कद्दावर कांग्रेस नेता प्रभु नारायण टंडन को इंदिरा लहर में जमकर टक्कर दी लेकिन अंततह उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

हार कर भी विपक्ष के अपराजेय योद्धा के रूप में अपनी पहचान बना चुके बाबू विजय कुमार मलैया ने इसके बाद कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा लेकिन इनके द्वारा तैयार की गई राजनीतिक जमीन पर इनके युवा बेटे जयंत मलैया को 1984 के उपचुनाव में तत्कालीन विधायक चंद्र नारायण टण्डन के निधन के बाद भाजपा प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरने का मौका मिला और उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल की। हालांकि इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के युवा तुर्क मुकेश नायक से अप्रत्याशित तौर पर श्री जयंत मलैया को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इसके बाद 1990 से 2017 तक दमोह विधान सभा क्षेत्र से अपराजेय योद्धा के रूप में वह निर्वाचित होते रहे। जिसके पीछे कहीं ना कहीं उनके पिता बाबू विजय कुमार जी मलैया द्वारा तैयार की गई वह ठोस राजनीतिक जमीन थी जिस पर वह 27 वर्षों तक अंगद के पैर की तरह जमे रहे। 

आज बाबू विजय कुमार जी मलैया इस नश्वर काया को त्याग कर भले ही दुनिया से विदा हो गए हो लेकिन उनकी सादगी सच्चाई उदारता मिलनसारता वर्षों तक सभी को याद रहेगी।  बाबू विजय कुमार मलैया के साथ 1971 और 1980 के चुनाव में सहयोगी रहे स्वर्गीय पिताश्री रतन चंद जैन द्वारा पूर्व में सुनाए गए संस्मरण पर यह आधारित यह जानकारी Atal न्यूज़24 परिवार की और से बाबूजी को सादर विनयांजलि.. अटल राजेन्द्र जैन

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