गोदनामा अवैध, अपर कलेक्टर कोर्ट ने खारिज की अपील
दमोह।
बाल कल्याण समिति का आदेश बरकरार, संस्थागत संरक्षण में ही रहेगी नवजात
बच्ची। 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर फर्जी तरीके से गोदनामा तैयार कर
नवजात बच्ची को अपने पास रखने के चर्चित मामले में अपर कलेक्टर न्यायालय
(जिला दमोह) ने अहम फैसला सुनाया है। न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दायर
अपील याचिका (क्रमांक 072/वर्ष-2026-27) को निरस्त करते हुए बाल कल्याण
समिति (CWC) दमोह के आदेश को यथावत रखा है। पीडिता द्वारा माननीय उच्च
न्यायलय में भी याचिका दायर कि थी जिसमे माननीय उच्च न्यायालय ने 03/08/26
को आदेश पारित करते हुए कलेक्टर दमोह को 60 दिवस में अपील निराकरण करने
हेतु निर्देशित किया था। CWC की काउंसलिंग और रेस्क्यू कार्यवाही मामले में
बाल कल्याण समिति दमोह द्वारा विधिवत समस्त पक्षकारों की सुनवाई की गई थी।
इसके बाद थाना प्रभारी हटा को पत्र जारी कर नवजात शिशु को सकुशल रेस्क्यू
कराया गया। दिनांक 29 मई 2026 को समिति के सदस्यों द्वारा एकांत में
नाबालिग पीड़िता की काउंसलिंग की गई, जिसका उल्लेख CWC की आदेश पत्रिका
क्रमांक 21 पर दर्ज है। समिति ने नवजात शिशु का सर्वोत्तम हित ध्यान में
रखते हुए नियमानुसार प्रारूप 18 में आदेश पारित कर बच्ची को मामले के अंतिम
निराकरण तक 'मातृछाया शिशुगृह सेवा भारती, सागर' में अस्थायी तौर पर रखने
का निर्णय लिया था। न्यायालय ने इस आदेश को कानूनन सही पाते हुए इसमें किसी
भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता से इनकार कर दिया। स्टाम्प पर बना
गोदनामा गैर-कानूनी, प्रक्रिया में पाई गई गंभीर कमियां मामले की विवेचना
में सामने आया कि 05 सितंबर 2025 को निष्पादित गोदनामा पूरी तरह से किशोर
न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 के नियमों के विपरीत था।
दस्तावेजी जांच में पाया गया कि गोदनामा निष्पादन के समय पीड़िता
(नाबालिग) की उम्र आधार कार्ड के अनुसार केवल 17 वर्ष 05 माह थी, यानी वह
पूर्णतः अवयस्क थी। इसके अलावा, भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास
मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना में एकल दत्तक माता-पिता की आयु
सीमा 40 वर्ष तय की गई है, जबकि आवेदक पिंकी किन्नर द्वारा प्रस्तुत जवाब
में अपनी आयु 32 वर्ष बताई गई, जो निर्धारित मानकों का स्पष्ट उल्लंघन है।
अदालत की सख्त टिप्पणीः न मां के पास सुरक्षित, न ही किन्नर के पास प्रकरण
में अपीलार्थी के तकों, अध्यक्ष बाल कल्याण समिति के जवाब और मूल अभिलेखों
के अवलोकन के बाद अपर कलेक्टर न्यायालय ने माना कि भले ही गोदनामा स्वेच्छा
से किया गया हो, लेकिन नवजात बच्ची का भविष्य न तो पिंकी किन्नर के पास
सुरक्षित है और न ही उसकी जैविक माँ के साथ।
न्यायालय ने आशंका जताई कि यदि
बच्ची को माँ के सुपुर्द किया जाता है, तो भविष्य में उसके पुनः पिंकी
किन्नर के पास चले जाने की प्रबल संभावना बनी रहेगी। विशेषज्ञ दत्तक एजेंसी
में भेजने के आदेश बच्ची के सुरक्षात्मक और उज्ज्वल भविष्य को प्राथमिकता
देते हुए अदालत ने बाल कल्याण समिति जिला दमोह के मामला क्रमांक 65/25 में
पारित आदेश दिनांक 30.05.2026 को स्थिर रखा है। साथ ही CWC को निर्देशित
किया है कि आदेश पारित होने के बाद शिशु को अपनी अभिरक्षा में रखते हुए,
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 के प्रावधानों के
तहत दीर्घकालिक अवधि के लिए उसे विशेषज्ञता प्राप्त दत्तक ग्रहण अभिकरण में
भेजने की कार्यवाही अविलंब प की जाए।


0 टिप्पणियाँ