निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी के 64 वें अवतरण दिवस पर विशेष.. मुनि संघ के साथ नगर गौरवों का आगमन आज.. नवीन बेदी पर प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित..

संयम, समता और साहित्य-साधना के अप्रतिम पुरोधा
13 जुलाई 1962 (वि.सं. 2019) को मध्यप्रदेश के सागर जिले के नन्ही देवरी ग्राम में धर्मनिष्ठ श्रावक दम्पति श्री राजाराम जी जैन एवं श्रीमती चन्द्ररानी जैन के पावन आँगन में बालक प्रवीण कुमार का जन्म हुआ। यही बालक आगे चलकर दिगम्बर जैन परम्परा के तेजस्वी संत, निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समता सागर महाराज के रूप में देशभर में संयम, समता और आत्मजागरण का दिव्य संदेश देने वाले महान संत बने।
बाल्यकाल से ही उनमें धर्म, अध्ययन, वैराग्य और आत्मचिंतन के संस्कार स्पष्ट रूप से विद्यमान थे। सांसारिक वैभव के प्रति अनासक्ति तथा आत्मकल्याण की उत्कृष्ट भावना ने उन्हें अल्पायु में ही संयम-पथ की ओर प्रेरित किया। उच्च माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत वर्ष 1980 में पावन सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि में संत शिरोमणी आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के संघ में प्रवेश कर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन धर्म-साधना को समर्पित कर दिया।

11 नवम्बर 1982 को सिद्धक्षेत्र नेनागिरि में आजीवन व्रत-प्रतिमा धारण करने के पश्चात 10 फरवरी 1983 को तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर में ऐलक दीक्षा प्राप्त की तथा 25 सितम्बर 1983 को ईसरी चातुर्मास के दौरान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण कर संयम-पथ पर अग्रसर हुए। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावशाली शिष्यों में अग्रगण्य पूज्य मुनि श्री समता सागर महाराज अपनी ओजस्वी वाणी, गहन शास्त्रज्ञान, सरल व्यक्तित्व और वात्सल्यपूर्ण व्यवहार के लिए देशभर में आदरपूर्वक स्मरण किए जाते हैं। आपने पदविहार के माध्यम से धर्मप्रभावना का व्यापक कार्य किया है। आप केवल तपस्वी संत ही नहीं, बल्कि एक प्रखर चिंतक, कुशल वक्ता, साहित्यकार और प्रभावशाली धर्मप्रचारक भी हैं। आपके प्रेरक प्रवचनों ने हजारों युवाओं को भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन, नैतिक जीवन तथा संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की है। 

साहित्य के क्षेत्र में अत्यंत उल्लेखनीय योगदान- 'सागर बूँद समाय', 'सर्वोदय सार', 'तेरा सो एक', 'श्रावकाचार कथा कुंज', 'स्तुति निकुंज', 'बेजुबानों की बात', 'सुप्रभाती', 'समाधि तंत्र', 'महायोगी महावीर', 'जैन तत्वबोध', 'निर्वाण भूमियाँ' तथा 'प्रवचन प्रमेय' सहित अनेक ग्रंथों का लेखन, संपादन एवं संकलन आपने किया है। आपके लेख, प्रवचन और काव्य धर्म, दर्शन तथा जीवन-मूल्यों की अमूल्य धरोहर हैं।
मुनिश्री का सम्पूर्ण जीवन समता, अहिंसा, आत्मानुशासन, करुणा और लोकमंगल की साधना का जीवंत उदाहरण है। आपके प्रत्येक प्रवचन का मूल संदेश यही है
समता ही साधना का प्राण है और आत्मा की शुद्धि का सबसे सहज मार्ग.. आपकी वाणी में शास्त्रों की गहराई के साथ जीवन की सहजता और व्यवहारिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।20 फरवरी 2022 को कुंडलपुर महामहोत्सव के पंचकल्याणक महोत्सव में तप-दीक्षा कल्याणक के पावन अवसर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने आपको पंचम निर्यापक श्रमण के गौरवपूर्ण दायित्व से विभूषित किया। 18 फरवरी 2024 को पूज्य गुरुदेव की समाधि के समय चंद्रगिरि तीर्थ पहुँचकर अंतिम क्षणों तक गुरुसेवा का अनुपम आदर्श प्रस्तुत कर अपने जीवन को धन्य एवं कृतार्थ बनाया।  वर्तमान में आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती साधकों में ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण के रूप में धर्मप्रभावना के कार्य में निरंतर संलग्न हैं। आपके पावन सान्निध्य में असंख्य श्रद्धालु आत्मजागरण, स्वाध्याय, तप और संयम की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। आप आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय मूल्यों के संवर्धन का प्रेरणादायी कार्य निरंतर कर रहे हैं।
13 जुलाई का यह पावन अवतरण दिवस केवल एक महापुरुष के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित समता, संयम, साधना, सेवा और सदाचार के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा का पावन पर्व है। उनका तपस्वी जीवन हमें यह संदेश देता है कि वास्तविक महानता बाह्य वैभव में नहीं, बल्कि आत्मविजय, त्याग और उच्च चरित्र में निहित होती है।निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समता सागर महाराज के 64 वें अवतरण दिवस पर समता सरोवर परिवार एवं समस्त जैन समाज उनके श्रीचरणों में कोटिशः वंदन अर्पित करते हुए उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ साधना तथा सतत धर्मप्रभावना की मंगलकामना करता है। "समता का प्रकाश जब अंतर्मन में जागता है, तभी आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होती है।" अविनाश जैन 'विद्यावाणी' राष्ट्रीय प्रवक्ता, समता सरोवर

पूज्य मुनि संघ के साथ नगर गौरव ऐलक छुल्लक महाराजो का भव्य मंगल आगमन आज.. दमोह। संत  शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी एवं परम पूज्य विद्या कुल शिरोमणि  आचार्य श्री 108  समय सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य  परम पूज्य मुनि श्री नीरज सागर जी एवं परम पूज्य मुनि श्री निर्मद सागर जी मुनि द्वय एवं ऐलक श्री चैत्य सागर जी अपार सागर जी, तन्मय सागर जी  आगत सागर जी  (नगर गौरव) क्षुल्लक श्री भास्वत सागर जी एवं स्वस्तिक सागर जी (नगर गौरव) का 14 जुलाई 2026 मंगलवार को  सुबह 7 बजे नगर आगमन की खबर से सकल जैन समाज में धर्म में उत्साह का माहौल बना हुआ है। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन सिंघई मंदिर समिति ने सकल जैन समाज से जबलपुर नाका पहुंचकर भव्य अगवानी में सम्मिलित होकर सतिशय पुण्य अर्जन की अपील की है।
वसुंधरा नगर जिनालय की नवीन बेदी पर प्राचीन प्रतिमाएं विधि विधान से स्थापित.. दमोह के वसुंधरा नगर में छुल्ला ग्राम से लाय गए समवशरण की प्रतिमाओं को नवीन बेदी पर पूर्ण विधि विधान एवं  अति हर्षउल्लास के साथ स्थापित किया गया। मूल नायक चंद्रप्रभु भगवान की सबसे बड़ी प्रतिमा को स्थापित करने का सौभाग्य डीसी जैन प्रकाश जैन के परिवार को प्राप्त हुआ..
द्वितीय चंद्रप्रभु भगवान की प्रतिमा को स्थापित करने का सौभाग्य  छुल्ला ग्राम के सभी आसामी गणों ने प्राप्त किया जबकि 400 वर्ष से अधिक प्राचीन प्रतिमाओं को स्थापित करने का सौभाग्य एन के जैन सुनील महेंद्र करुणा वेजीटेरियन परिवार एवं महेश जैन के परिवार को प्राप्त हुआ इसके अलावा अन्य प्रतिमाओं की भी स्थापना भक्तगनों के द्वारा की गई..
समारोह में सोधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य रमेश हरई कुबेर इंद्र चिंटू राजेश जैन महायज्ञानायक संजय जैन एवं यज्ञनायक बनने का सौभाग्य प्रकाश जैन के परिवार को प्राप्त हुआ छोला ग्राम के भक्तगणों  ने वसुंधरा नगर समिति का सम्मान पत्र भेंट कर अभिनंदन किया। 

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