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बारहवे तीर्थंकर भगवान वांसुपूज्य की.. जयपुर में निर्मित अष्टधातु की विशाल प्रतिमा की भव्य आगवानी.. दिगंवर जैन कांच मंदिर से सिंघई मंदिर तक.. आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज के सानिध्य में निकली शोभायात्रा..

 भगवान वांसुपूज्य की विशाल प्रतिमा की भव्य आगवानी.. 

दमोह। नगर के महावीर वार्ड स्थित श्री दिंगबर जैन सिंघई मंदिर जी में बारहवे तीर्थंकर भगवान वांसुपूज्य जी की विशाल प्रतिमा स्थापित होने जा रही है। प्रतिमा आगमन अवसर पर धन्य तेरस की पावन बेला में शुक्रवार सुबह स्टेशन रोड स्थित श्री आदिनाथ कांच मंदिरजी से एक भव्य शोभा यात्रा निकाली गई। इस अवसर पर वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में शोभायात्रा राय चैराहा से घंटाघर, टाकीज तिराहा, पुराना थाना होते हुए महावीर वार्ड स्थित सिंघई मंदिर जी पहुची।

सिंघई मंदिर जी में वासुपूज्य भगवान की पद्मासन अष्ट धातु से बनी 4 फीट 3 इंच ऊंचाई की विशालकाय प्रतिमा की गाजे-बाजे की जैन समाज के महिला पुरुषों के उपस्थिति में भव्य आगवानी की गई। जितेंद्र कुमार पुत्र नितिन कुमार, निशांत कुमार जैन हटा वालों ने यह प्रतिमा जयपुर में अपने सौजन्य से बनवाई है। धनतेरस के दिन आज मंदिर में लाई गई इस प्रतिमा को स्थापित करने के लिए चक्रेश कुमार जैन सिंघई के सौजन्य से मार्बल की वेदिका मंदिर जी में बनवाई गई है। इसी अवसर पर तपोवन तीर्थ सागर बहेरिया तिगड्डा पहाड़ी पर निर्माणाधीन मंदिर में श्री आशीष कुमार सोमिलकुमार संतोष कुमार जैन उस्ताद ने एक प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की।

इस अवसर पर वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने मंगल आशीर्वाद देते हुए कहा जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा स्वयं जिनेंद्र बनने के लिए की जाती है । जो भगवान की प्रतिमा स्थापित करके भगवान की पूजा अर्चना भक्ति एवं जिनेंद्र भगवान का रूप धारण करके तप करता है वह स्वयं एक दिन भगवान बन जाता है। भगवान की प्रतिमा को उच्च आसन  देने से स्वयं को उच्च पद पर स्थापित कर लेता है ।भगवान को नमस्कार करने से स्वयं लोग पूजा बन जाते हैं। दान देने से भोग उपभोग की वस्तुएं प्राप्त होती हैं। भक्ति करने से भक्ति करने वालों की सब लोग तारीफ करने लग जाते हैं। जगह-जगह प्रशंसा होने लगती है इसीलिए भगवान की प्रतिमा स्थापित करके भक्ति आराधना करते हैं। 

आचार्य श्री ने कहा दीपावली पर भक्ति श्रद्धा विश्वास ज्ञान और संयम के दीप जलाएं पटाखे ना चलाएं  ।दीपावली में मिट्टी के दीए में घी तेल डालकर दीपक जलाएं ,सोने चांदी के मैं नहीं। यह शरीर मिट्टी का बना है इससे एक दिन मिट्टी में मिलना है परंतु इसमें आत्मा का दीपक जल रहा है। उसे प्राप्त कर लेना चाहिए और अपने अज्ञान अंधकार को मिटाना चाहिए। यह शरीर मिट्टी के दीए के समान नाशवान है। मानव जीवन की सार्थकता ज्ञान की ज्योति जलाकर खुद को देखने लेने में है।  आयुष जैन की रिपोर्ट..

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