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रविवारीय धर्म सभा..गुरु के बिना ज्ञान का मार्ग प्रशस्त नहीं होता: आचार्य श्री उदार सागर महाराज-

गुरु के बिना ज्ञान का मार्ग प्रशस्त नहीं होता: आचार्य श्री उदार सागर महाराज-
दमोह। ज्ञान के अभाव में व्यक्ति का जीवन बिना नाव की पतवार जैसा होता है। उसे नहीं मालूम होता वह जो कर रहा है वह उसे कहा ले जाएगा। यह उचित है अथवा अनुचित है, सत्य है अथवा असत्य है। ऐसी ही  अज्ञानता के चलते व्यक्ति खुद को अनेक ऐसे संकटों में फंसा लेता है जिनसे बाहर निकलना किसी वरिष्ठ, अनुभवी, ज्ञानी व्यक्ति की मदद के बिना संभव नही होता। इसीलिए हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला ऐसा गुरू जरूर होना चाहिए जो हमारे अंदर सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र की ज्योति जलाकर हम सभी के मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करे।
 यह मंगल उद्गार श्री पारसनाथ दिगंबर जैन नन्हे मंदिर जी में रविवारीय धर्म सभा के अवसर पर आचार्य श्री 108 उदार सागर जी महाराज ने अभिव्यक्त किए। आचार्य श्री ने कहा कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिलता,  ज्ञान के अभाव में सत्य असत्य तो दूर वस्तु के स्वभाव का पता भी नहीं चलता। आचार्य श्री ने दूसरे देश पहुंचे एक व्यक्ति को वहां की भाषा समझ में नहीं आने से खाने-पीने की सामग्री खरीदने में होने वाली परेशानी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मिलने वाले नारियल के फल का उपयोग वह व्यक्ति खाने में नहीं कर पा रहा था। बाद में जब दूसरे व्यक्ति ने उसे नारियल खाने का तरीका बताया तो उसे वह बहुत स्वादिष्ट फल लगा।

एक अन्य उदाहरण के जरिए आचार्य श्री ने कहा कि एक व्यापारी दूर देश की यात्रा पर अपने साथ गाय को भी ले गया। वहां पर उसने भेंट स्वरूप राजा को गाय का दूध व उससे बने पकवान पेश किये। जिसे खाकर राजा बहुत खुश हुआ और उसने व्यापारी का टैक्स माफ कर दिया। व्यापारी ने राजा को बताया कि वह एक ऐसा पेड़ लेकर आया है जो ऐसे स्वादिष्ट फल देता है। व्यापारी वहां से जब वापस जाने लगा तो उसने वह गाय राजा को यह कह कर दे दिया वही पेड़ है जैसी स्वादिष्ट फल वह उन्हें भेंट करता था राजा ने खुशी-खुशी गाय को अपने पास रख लिया और सैनिकों की ड्यूटी लगा दी कि जैसे ही गाय कोई फल दे व उनकी सेवा में पेश करें। गाय के पेशाब गोवर करते ही सैनिको ने उसे फल समझा और राजा के पास लेकर पहुंच गए। जिन्हें चखते ही राजा थू थू करने लगा। जिस पर  राजा को लगा कि  व्यापारी ने उसे धोखा दिया है और उसने तुरंत व्यापारी को पकड़ने के आदेश दिया।
 सैनिक व्यापारी को पकड़कर राजा के सामने लाए और उसे जब सारी बात समझ में आई तो उसने राजा को गाय का दूध ढूह कर बताया कि महाराज यह गाय है। इसके दूध से ही वह सभी पकवान बनते थे जो मैंने आपको पेश किए थे। गाय के दूध देने और उस से बनने वाले पकवान ओं का ज्ञान जानकर राजा बहुत खुश हुआ और उसने पूरे देश में गाय पालने का आदेश दे दिया। आचार्य श्री ने कथा को यहीं विराम देते हुए कहा कि इसी तरह व्यक्ति के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जब वह हीरा और पत्थर में, सोना और पीतल में ज्ञान के अभाव में फर्क नहीं समझ पाता। ज्ञान के लिए गुरु का होना आवश्यक है, ऐसा गुरु जो ज्ञानी होने के साथ-साथ निरग्रंथ रत्नात्रय का धारी हो। सच्चे देव शास्त्र गुरु के उपासना का मार्ग दिखाता हो। ऐसे गुरु की शरण चरण में जाकर हमें अपने जीवन को धर्म आचरण में लगा कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करने हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए।
ईर्ष्या और असंतोष प्रगति में सबसे बड़े बाधक: मुनि श्री उपशान्त सागर-
इसके पूर्व धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री उप शांत सागर जी महाराज ने कहा कि जलन तथा असंतोष का भाव व्यक्ति के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। आज हर व्यक्ति यह नहीं देखता कि उसके पास क्या है। वह सामने वाले को देख कर चलता है, जलता है और फिर गिर कर परेशान होता है। उन्होंने दो पड़ोसियों की कथा सुनाते हुए कहा कि आपस मेंं अच्छे मित्र होनेेे के बाद भी दोनों के बीच ईर्ष्या भाव बने रहते थे। दोनों एक ही देवता की पूजा करते थे, एक दिन देवता उन पर प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा। तथा शर्त रख दी कि जो पहले मांगेगा उस से दुगना दूसरे को अपने आप मिल जाएगा। यह शर्त सुनते ही दोनों खामोश हो गए क्योंकि उन्हें लग रहा था हम जो मांगेंगे दूसरे को अपनेेेे आप उससे दुगना मिल जाएगा इसी जलन भावना के कारण काफी देर तक वह कोई वरदान नहीं मांग सकें। दोनों के बीच देर तक जब कोई  फैसला नहीं हो सका देवता जाने लगे। तो एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि मेरी एक आंख फूट जाए तथा दूसरे व्यक्ति के घर के सामने कुआं खुद जाए। 
दरअसल पहले व्यक्ति के दिमाग में है सोच था कि उसकी एक आंख बची रहेगी लेकिन सामने वाली की दोनों आंखें फूट जाएगी और वह कुएं में गिर जाएगा। मुनि श्री ने कहा कि असंतोष के भाव ही हमें आगे नहीं बढ़ने देते। बहुत से लोग ऐसे भी मिल जाएंगे जो पुण्य पाप को नहीं मानते। तथा  कहते हैं कि स्वर्ग नरक किसने देखा जो करना है अभी कर लो। ऐसे लोगों की निश्चित तौर पर दुर्गति होती है और यह नरक ही जाते हैं। मुनि श्री नेे कहा जीवन में असंतोष का त्याग करके संतोष लाकर और ईर्ष्या भाव को छोड़ने वाला व्यक्ति ही धर्म मार्ग पर प्रशस्त होता है तथा अपनी इस पर्याय को सफल बनाता है। हमें भी ऐसे धर्म मार्ग पर चलने के लिए सत्य आसत्य स्वर्ग नर्क का अंतर समझते हुए असंतोष और ईर्ष्या का त्याग करना चाहिए। 

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