दमोह संसदीय क्षेत्र से प्रताप की उम्मीदवारी से पिछले वार जैसी आसान नही प्रहलाद की राह.. भाजपा को लोकसभा-कांग्रेस को विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना सबसे बड़ी चुनौती..

प्रताप की उम्मीदवारी से आसान नही प्रहलाद की राह-
दमोह। संसदीय क्षेत्र से भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशीयो की तस्वीर साफ हो जाने के बाद दोनों दलो को विधान सभा चुनाव के प्रदर्शन को कायम रखना सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।  दमोह लोकसभा की राजनीतिक फिजा में पिछले पांच सालों में जो बदलाव आया है उससे भाजपा के प्रहलाद की राह अब पहले जैसी आसान नही रही है। वही कांग्रेस के प्रताप के समक्ष सबसे बड़ी चुनोती आठों क्षेत्रो में विधान सभा चुनाव के कांग्रेस के प्रदर्शन को बरकरार रख पाना है।
 दमोह संसदीय क्षेत्र में इस बार का लोकसभा चुनाव बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि के नाम अक्षर वाले भाजपा कांग्रेस प्रत्याशी प्रहलाद पटेल और प्रताप सिंह के बीच होने जा रहा है। दोनों ही लोधी समाज से है। उम्र के मामले में महज एक साल का फर्क रहने के बावजूद वर्तमान में जो हालात है उससे मुकाबला एक पर एक अर्थात कांटे का होना तय माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव लड़ने के मामले में प्रहलाद पटेल काफी सीनियर है। वह 1989 से लोकसभा चुनाव लड़ते आ रहे है। 
प्रहलाद का यह 8 वा लोकसभा चुनाव है। इसके पहले के 7 चुनाव में 4 जीत तथा 3 हार के साथ एक जीत के बाद एक हार का अनोखा रिकार्ड भी इनके नाम पर दर्ज है। इस बार के चुनाव में इस मिथक को तोड़ना भी इनके सामने चुनौती है। इधर कांग्रेस प्रत्याशी प्रताप सिंह का यह पहला लोकसभा चुनाव है। दो बार विधान सभा चुनाव लड़ चुके प्रताप के नाम पर भी एक जीत तथा एक हार का रिकार्ड दर्ज है। तथा उनके पास खोने को के लिए कुछ भी नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय संसदीय क्षेत्र की 8 विधानसभा सीटों की बात की जाए तो उस समय भाजपा के कब्जे में दमोह, पथरिया, हटा, बंडा, रहली मलहरा कुल 6 सीटे थी। कांग्रेस के पास सिर्फ दो सीट जबेरा और देवरी ही थे। मोदी लहर में प्रहलाद ने कांग्रेस के महेन्द्र प्रताप सिंह को 2 लाख 13 हजार वोटों से करारी मात दी थी। 
2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व संसदीय क्षेत्र के विधानसभा क्षेत्रों के छत्रपो की स्थिति में काफी बदलाव आया है। नवंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा विधायक अपना प्रदर्शन नहीं दोहरा सके। जिससे संसदीय क्षेत्र में भाजपा विधायकों की संख्या 6 से 3 अर्थात आधी रह गई है। वही कांग्रेस विधायकों की संख्या 2 से 4 यानि डबल हो चुकी है। बसपा भी पथरिया से अपना खाता खोलकर दोनों दलों की वोटों में सेंध लगाने के संकेत दे चुकी है। दमोह संसदीय क्षेत्र में विधानसभा चुनाव के दौरान आठो क्षेत्रो में कांग्रेस को मिले मतो में जमकर इजाफा होने से  लोकसभा चुनाव में मिले 2 लाख 13 हजार की हार के अंतर को 15 हजार पर सिमटा दिया है।
 5 महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में संसदीय क्षेत्र के 8 में से 7 सामान्य क्षेत्रो से लोधी समाज के 4 प्रत्याशी जीत दर्ज करने में सफल रहे थे। इनमे कांग्रेस से 3 तथा भाजपा से एक लोधी प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। संसदीय क्षेत्र में चार लोधी विधायक चुने जाने के बाद भाजपा के बाद कांग्रेस को भी लोधी समाज से अपना प्रत्याशी चुनने को मजबूर होना पड़ा है। भाजपा के प्रहलाद के मुकाबले कांग्रेस के प्रताप सिंह भले ही लोकसभा चुनाव लड़ने के मामले में अनुभव नही रखते हो लेकिन प्रत्याशी घोषित होते ही उनको मजबूत प्रत्याशी के तौर पर देखा जाने लगा है। हालांकि प्रहलाद के मुकाबले प्रताप अपना कितना प्रताप दिखा पाएंगे इसका पता नतीजो के बाद ही लगेगा। लेकिन कांग्रेस के सामने पहली चुनौती विधानसभा चुनाव की प्रदर्शन को दोहराना रहेगा। वही भाजपा को विधानसभा चुनाव के दौरान मिले वोटों में वृद्धि करना पहली चुनौती होगा।
 आंकड़ों के साथ लिखने को बहुत कुछ है, एक ही बार में सब कुछ लिखना जल्दबाजी होगा। विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के लिहाज से परिणामों का लोकसभा चुनाव में क्या असर पड़ेगा ? संसदीय क्षेत्र में बदले हुए हालात में कौन नेता क्या गुल खिलाएगा ? प्रहलाद पटेल एक जीत एक हार के मिथक को क्या तोड़ पाएंगे ? ऐसे अनेक सवालो के जबाव मतदाताओं के जेहन में उपज रहे हैं। प्रहलाद और प्रताप की क्या राजनीतिक तैयारियां चल रही है तथा किस क्षेत्र में कौन नेता पर्दे के पीछे किसका साथ देगा आदि अपडेट के साथ जल्द मिलते है। अटल राजेंद्र जैन 
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